कमजोर दिल वालों के शरीर में दिखते हैं ये लक्षण These symptoms are seen in the body of people with weak heart

Image
  कमजोर दिल वालों के शरीर में दिखते हैं ये लक्षण, गलती से भी न करें नजरअंदाज These symptoms are seen in the body of people with weak heart, do not ignore them even by mistake. हार्ट कमजोर होने पर शरीर में कई तरह के लक्षण महसूस हो सकते हैं। आइए जानते हैं इन लक्षणों के बारे में दुनियाभर में हार्ट रोगियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आज के समय में 30 से 40 साल के लोगों की भी हार्ट अटैक से मौत हो रही है। इसका कारण खराब खानपान, लाइफस्टाइल बेहतर न होना, स्ट्रेस में रहना इत्यादि है। इसके अलावा हार्ट डिजीज के कई कारण हो सकते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हार्ट कमजोर होने के लक्षण हमारे शरीर में पहले से ही नजर लाने लगते हैं। अगर आप इन लक्षणों पर समय पर ध्यान देंगे, तो काफी हद तक हार्ट अटैक और हार्ट फेलियर जैसी परेशानियों को रोका जा सकता है। आइए जानते हैं कमजोर दिल होने के क्या लक्षण हैं? हैलो फ्रेंड्स! मैं { DR MD GYASUDDIN } { डॉक्टर मोहम्मद ग्यासुद्दीन } मैं आप लोगों को हेल्थ से जुड़ी जानकारियां इस लेख (आर्टिकल) के जरिये देता हूं। मेरे इस पोस्ट से आपको कुछ मदद मिले यही मेरा ल...

गर्भावस्था में प्लेसेंटा की भूमिका संरचना, कार्य Placenta Role in Pregnancy: Structure, Function

प्लेसेंटा क्या है? – गर्भावस्था में उसकी भूमिका संरचना, कार्य और महत्व What is the placenta? – its role, structure, function, and importance in pregnancy

प्लेसेंटा क्या होता है? What is placenta?

प्रेगनेंसी के दौरान बच्चेदानी में विकसित होने वाला एक अस्थायी अंग है प्लेसेंटा। यह माँ और शिशु के बीच एक जीवन रेखा की तरह काम करता है। प्लेसेंटा शिशु को ऑक्सीजन और पोषण देता है और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है।

हैलो फ्रेंड्स!

मैं { DR MD GYASUDDIN } { डॉक्टर मोहम्मद ग्यासुद्दीन }

मैं आप लोगों को हेल्थ से जुड़ी जानकारियां इस लेख (आर्टिकल) के जरिये देता हूं। मेरे इस पोस्ट से आपको कुछ मदद मिले यही मेरा लक्ष्य है हमारा उद्देश्य है कि आपको इस विषय की पूरी जानकारी मिले और अगर आप या आपका कोई करीबी इस स्थिति से गुजर रहा है, तो आप बेहतर तरीके से इसका सामना कर सकें। तो अगर आपको मेरा लेख ( आर्टिकल ) अच्छा लगे तो फॉलो जरूर करें।

आइए जानते हैं, क्या, क्यों, कैसे होता है। कारण, लक्षण और उपचार के बारे में इत्यादि।

इतना ही नहीं, प्लेसेंटा हार्मोन बनाकर प्रेगनेंसी को सुरक्षित बनाए रखता है और गर्भ में पल रहे शिशु को हानिकारक बैक्टीरिया एवं वायरस से बचाता है। शिशु के जन्म के बाद प्लेसेंटा शरीर से बाहर निकल जाता है, जिसे ‘आफ्टर बर्थ’ कहते हैं।

प्लेसेंटा की स्थिति गर्भाशय में किसी भी ओर हो सकती है – आगे (front), पीछे (back), ऊपर (top) या किनारे (lateral)। इनमें से अगर यह गर्भाशय की अगली दीवार की ओर स्थित हो, तो इसे एंटीरियर प्लेसेंटा कहते हैं।

गर्भावस्था के दौरान शिशु के सही विकास और अच्छे स्वास्थ्य में प्लेसेंटा (Placenta) बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह शिशु तक जरूरी पोषण, पानी और ऑक्सीजन पहुंचाता है, जिससे बच्चा मजबूत और स्वस्थ रूप से बढ़ सके।

पोस्टीरियर प्लेसेंटा क्या है? What is the posterior placenta?

पोस्टीरियर प्लेसेंटा वह स्थिति है, जब आपकी नाल या प्लेसेंटा (placenta) गर्भाशय की पिछली दीवार यानी पीठ (रीढ़) की ओर जुड़ी होती है। अक्सर इस स्थिति को सामान्य स्थिति में ही गिना जाता है और खतरे का संकेत नहीं माना जाता है। करीब 70-75% महिलाओं में प्रेगनेंसी के दौरान यह स्थिति देखी जाती है, और यह डिलीवरी, बच्चे के विकास या मां की सेहत के लिए आमतौर पर कोई परेशानी नहीं होती है। जब महिलाएं अल्ट्रासाउंड कराती हैं तो उस रिपोर्ट में पोस्टीरियर प्लेसेंटा लिखा होता है। यह मेडिकल शब्द है यह एक सामान्य अवस्था है, जो स्वस्थ गर्भावस्था के साथ जुड़ी रहती है और यदि आपके मन में संदेह है, तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलें और उनसे अपने प्रश्नों के उत्तर को जानें।

प्लेसेंटा एक ऐसा अस्थाई अंग है जो गर्भावस्था के दौरान गर्भ में शिशु को गर्भाशय (Uterus) से जोड़ता है। प्रेगनेंसी के. तुरंत बाद प्लेसेंटा विकसित होने लगता है और गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाता है। गर्भ में शिशु गर्भनाल (Umbilical Cord) के जरिए प्लेसेंटा से जुड़ा होता है। प्लेसेंटा और गर्भनाल मिलकर गर्भाशय में शिशु की लाइफ लाइन के रूप में कार्य करते हैं।

यह गर्भ में शिशु को ऑक्सीजन और पोषक तत्व (Oxygen and Nutrition) प्रदान करते हैं, जो गर्भ में शिशु के विकास के लिए जरूरी होता है। इतना ही नहीं यह गर्भ में शिशु के रक्त से अशुद्धियां भी बहार निकालने में मदद करता है।

एंटीरियर प्लेसेंटा क्या है? What is an anterior placenta

एंटीरियर प्लेसेंटा गर्भाशय की आगे की दीवार यानी पेट की तरफ बनता है। यह गर्भावस्था में सामान्य स्थिति होती है और आमतौर पर किसी जटिलता से जुड़ी नहीं होती है। एंटीरियर प्लेसेंटा के कारण मां को शिशु की हरकतें महसूस करने में थोड़ी देरी हो सकती है क्योंकि मां और शिशु के बीच एक मोटी परत का कुशन जैसा असर होता है। गर्भावस्था बढ़ने के साथ-साथ प्लेसेंटा की स्थिति भी थोड़ी बदलती है। आमतौर पर यह स्थिति 18 से 21 सप्ताह की अल्ट्रासाउंड जांच में सामने आती है।

प्लेसेंटा की संरचना The structure of the placenta

यह एक डिस्क आकार का होता है, जो मां और भ्रृण के टिशू से विकसित होता है। इसका वजन 500 ग्राम होता है। यह 10 इंच लंबा और बीच में से 1 इंच मोटा होता है। इसका रंग गहरा लाल होता है। प्लासेंटा (placenta) की दो साइड होती है, जिसमें से एक साइड गर्भाशय से जुड़ी होती है, जो ग्रे रंग की होती है और दूसरी साइड गर्भाशय की दीवार से जुड़ी हुई होती है, जिसका रंग नीला लाल होता हैं।

बच्चे के जन्म के तुरंत बाद प्लेसेंटा भी निकल जाता है। अगर बच्चे का जन्म नॉर्मल डिलीवरी (Normal Delivery) से होता है तो प्लेसेंटा बर्थ कैनाल से हीं बहार निकलता है और अगर सी-सेक्शन डिलीवरी हुई हो डॉक्टर प्लेसेंटा को काटकर हटा देते हैं।

प्लेसेंटा में रक्त परिसंचरण कैसे होता है। How does blood circulation occur in the placenta

भ्रूणीय रक्त जो कि तुलनात्मक कम ऑक्सीजनित होता है भ्रूण के हृदय द्वारा प्लेसेंटा की ओर दो नाभि धमनियां‌ की शाखाओं से होता हुआ कोरियोनिक विली तक पहुंच जाता हैं।

  1. कोरियोनिक विली के समीप ही रक्त कोटर या इटरविलस स्पेस होता है इसमें मातृ रक्त भरा होता है यह मातृ रक्त या भ्रूण का खून की तुलना में उच्च पोषक पदार्थों युक्त एवं आक्सिकृत होता है।
  2. रक्त में पदार्थों के आदान-प्रदान के पश्चात शुद्ध रक्त एक नाभि शिरा के द्वारा भ्रूण के हृदय तक पहुंचा दिया जाता है जहां से वह संपूर्ण भ्रूण को वितरित कर दिया जाता है।

प्लेसेंटा कब और कैसे बनता है? When and how is the placenta formed

प्लेसेंटा गर्भावस्था में शिशु के विकास और माँ की सेहत के लिए बेहद महत्वपूर्ण अंग है। कन्सेप्शन के तुरंत बाद जब फर्टिलाइज़्ड एग गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) की दीवार से चिपकता है तभी प्लेसेंटा बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पहली तिमाही यानी 0 से 12 सप्ताह में यह माँ की रक्त वाहिकाओं यानी ब्लड वेसेल्स (Blood Vessels) से जुड़कर भ्रूण को पोषण और ऑक्सीजन पहुंचाना शुरू करता है और हार्मोन बनाकर प्रेगनेंसी को सुरक्षित बनाए रखता है। दूसरी और तीसरी तिमाही में प्लेसेंटा पूरी तरह विकसित होकर गर्भनाल यानी अम्बिलिकल कॉर्ड (Umbilical Cord) के माध्यम से लगातार शिशु को पोषण और ऑक्सीजन पहुंचाता है। बच्चे के जन्म के बाद यह शरीर से बाहर निकल जाता है, जिसे आमतौर पर ‘आफ्टर बर्थ’ (After Birth) कहा जाता है।

प्लेसेंटा का निर्माण कब और कैसे होता है? When and how is the placenta formed

प्लेसेंटा का निर्माण गर्भाधान के तुरंत बाद शुरू हो जाता है। आइये जानते है..

  1. पहला चरण (गर्भाधान या कंसेप्शन के बाद) :- Stage 1 (after conception) :- गर्भावस्था (Pregnancy) के 7-10 दिन बाद प्लेसेंटा बनना शुरू हो जाता है। जब फर्टाइल अंडा गर्भाशय की दीवार से जुड़ता है तब प्लेसेंटा का निर्माण शुरू हो जाता है।
  2. पहली तिमाही (0-12 सप्ताह) :- First trimester (0-12 weeks) :- इस दौरान प्लेसेंटा माँ की रक्त वाहिकाओं से जुड़ता है और शिशु को ऑक्सीजन एवं पोषण देना शुरू करता है। साथ ही, प्रेगनेंसी को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हार्मोन का निर्माण करता है।
  3. दूसरी और तीसरी तिमाही (13-40 सप्ताह) :- Second and third trimesters (13-40 weeks) :- इस दौरान प्लेसेंटा पूरी तरह से विकसित हो जाता है। यह गर्भनाल के जरिए शिशु तक सभी जरूरी चीजें पहुँचाता है।
  4. डिलीवरी के बाद :- After delivery :- शिशु के जन्म के कुछ मिनटों बाद प्लेसेंटा भी बाहर निकल जाता है। इसे ‘आफ्टर बर्थ’ कहा जाता है।

प्लेसेंटा कितने प्रकार के होते हैं।‌ How many types of placenta are there

  1. एंटीरियर प्लेसेंटा :- Anterior placenta :- यह बच्चेदानी की आगे की दीवार पर होता है। गर्भाशय की आगे की दीवार पर प्लेसेंटा विकसित होता है, जबकि भ्रृण का विकास उसके पीछे होता है, इस स्थिति को इंटीरियर प्लेसेंटा कहते हैं।
  2. पोस्टीरियर प्लेसेंटा :- Posterior placenta :- यह बच्चेदानी की पीछे की दीवार पर होता है। जहां पर फर्टाइल अंडा जुड़ा हुआ होता है, वहां गर्भाशय की दीवार के पास प्लेसेंटा विकसित होता है तो इसे पोस्टीरियर प्लेसेंटा कहा जाता है।
  3. फंडल प्लेसेंटा :- Fundal placenta :- यह बच्चेदानी के ऊपरी हिस्से में होता है। जब प्लेसेंटा गर्भाशय के ऊपर की दीवार से जुड़ जाता है तो उसे फंडल प्लेसेंटा कहा जाता है।
  4. लो-लाइंग प्लेसेंटा :- Low-lying placenta :- यह बच्चेदानी के निचले हिस्से में होता है। जब गर्भाशय के निचले हिस्से में प्लेसेंटा विकसित हो तो उसे लो-लाइंग प्लेसेंटा कहते हैं।

प्लेसेंटा का विकास निम्न परतो से मिलकर होता है। The placenta develops from the following layers

  1. इंप्लांटेशन के पश्चात ब्लास्टोसाइट गर्भाशय की दीवार में स्थित होता है जो की इंडोमैट्रियल-सेल्स द्वारा आस्तरित होता हैं।‌
  2. ब्लास्टोसाइट की ट्रोफोब्लास्ट परत से उभारों (Projections) का निर्माण होता है। जो लगभग 3 सप्ताह तक शाखित संरचना का निर्माण करते हैं यह संरचना (Chorionic villi) कहलाती है।
  3. ये कोरियोनिक विली वहां संख्या में अत्यधिक पाई जाती है जहां ब्लड सप्लाई अधिक होती है एवं यह क्षेत्र मातृ स्तर (decidua basalis), होता है।
  4. इस समय ट्रोफोब्लास्ट स्तर निर्मित (Chorionic villi) का स्तर कोरियोनिक फ्रुंडोसम‌ लाता है यही आगे चलकर प्लेसेंटा का निर्माण करता है।
  5. प्रत्येक कोरियोनिक विली एक शाखित संरचना होती है जिसका विकास एक मूल नलिका द्वारा होता है। इस मूल नलिका में फ्रुंडोसम‌ भ्रूणीय रक्त वाहिनियां‌ गर्भनाल धमनी एवं नस होती है।
  6. ये कोरियोनिक विली मातृत्व से संयोजित हो जाते हैं एवं प्लेसेंटा का निर्माण करता है।
  7. 6वे सप्ताह में बनना शुरू हो जाता है। 12वे सप्ताह से लेकर 20वे‌ सप्ताह तक प्लेसेंटा का भार भ्रूण की तुलना में अधिक होता है।

प्लेसेंटा क्या काम करता है? What does the placenta do?

प्लेसेंटा मां और अजन्मे बच्चे के बीच के बीच एक जीवन बचाने वाला पुल है, जो बच्चे को वह सारे आवश्यक एवं पोषक तत्व प्रदान करता है, जिससे वह सारा समय मां के गर्भ में जीवित और स्वस्थ रहे। यह मुख्यतः इन कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है –

  1. ऑक्सीजन और पोषण पहुंचाना :- Delivering oxygen and nutrients :- प्लेसेंटा की मदद से मां का खून बच्चे तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहुंचाता है। उन्हीं की मदद से बच्चों में ग्रोथ होती है।
  2. अपशिष्ट बाहर निकालना :- Removal of waste :- शिशु के शरीर से जो भी हानिकारक पदार्थ निकलता है, वह प्लेसेंटा के जरिए मां के रक्त में वापस जाता है और मां का शरीर उसे शरीर से बाहर निकालता है।
  3. हार्मोन बनाना :- Hormone production :- प्लेसेंटा गर्भावस्था को बनाए रखने में सहायक हार्मोन बनाता है, जैसे कि HCG (hcg level in pregnancy), प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन उत्पन्न करना।
  4. संक्रमण से सुरक्षा :- Protection from infection :- यह माँ की एंटीबॉडी बच्चों तक पहुँचाकर संक्रमण और बीमारियों से रक्षा करता है। इसके लिए गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान एक स्वस्थ जीवन शैली को अपनाने की सलाह दी जाती है।
  5. बच्चे के अंगों की ग्रोथ :- Growth of the baby's organs :- शिशु के मस्तिष्क, फेफड़े और अन्य अंगों के विकास के लिए जरूरी तत्व प्लेसेंटा से ही मिलते हैं।
  6. इम्यून सपोर्ट :- Immune support :- माँ के शरीर से शिशु की सुरक्षा करना।

गर्भावस्था पर एंटीरियर प्लेसेंटा का प्रभाव Effects of an anterior placenta on pregnancy

प्लेसेंटा की स्थिति चाहे वह आगे, पीछे, ऊपर या किनारे हो। आमतौर पर गर्भावस्था को प्रभावित नहीं करती। लेकिन जब प्लेसेंटा गर्भाशय ग्रीवा (cervix) को ढक देता है, तब समस्या होती है। इस स्थिति को प्लेसेंटा प्रीविया कहते हैं और इसमें सामान्य प्रसव संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में सी-सेक्शन डिलीवरी करनी पड़ सकती है। हालांकि, एंटीरियर प्लेसेंटा में ऐसा खतरा नहीं होता, इसलिए गर्भावस्था और प्रसव सामान्य रूप से हो सकते हैं। कभी-कभी एंटीरियर प्लेसेंटा के कारण शिशु की स्थिति ‘बैक टू बैक’ (Occipito posterior) हो सकती है, जिसमें शिशु का सिर नीचे होता है लेकिन उसकी पीठ मां की रीढ़ की ओर होती है।

प्लेसेंटा से जुड़ी सामान्य समस्याएँ Common problems related to the placenta

प्लेसेंटा के बिना गर्भ स्थ शिशु का विकास असंभव है, हालांकि प्लेसेंटा का कार्य महत्वपूर्ण होने के साथ ही उससे जुड़ी कुछ जटिलताओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

प्लेसेंटा सामान्य है, पर कुछ महिलाओं को अपनी प्रेगनेंसी के दौरान निम्न समस्याएं हो सकती हैं –

किसी भी असामान्य दर्द, अचानक ब्लीडिंग, या हलचल में बदलाव महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

  1. प्लेसेंटा प्रीविया :- Placenta previa :- जब प्लेसेंटा बच्चेदानी के मुँह को ढक लेता है तो सामान्य डिलीवरी संभव नहीं होती है। इससे अधिक ब्लीडिंग का खतरा होता है और डिलीवरी के लिए आमतौर पर सी-सेक्शन की जरूरत पड़ती है।
  2. प्लेसेंटा एब्ड्रप्शन :- Placental abruption :- जब प्लेसेंटा समय से पहले बच्चेदानी की दीवार से अलग हो जाता है तो शिशु को ऑक्सीजन और पोषण मिलना बंद हो सकता है। इसके कारण माँ को पेट में तेज दर्द और ब्लीडिंग हो सकती है। इस स्थिति में प्री मैच्योर डिलीवरी करना पड़ सकता है। और ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
  3. अपरिपक्व या असामान्य प्लेसेंटा :- An immature or abnormal placenta :- प्लेसेंटा पूरी तरह विकसित नहीं होने पर शिशु का विकास भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप कराना जरूरी होता है।
  4. पीठ दर्द :- Back pain :- पीठ पर अधिक दबाव के कारण कुछ महिलाओं को दर्द महसूस हो सकता है।
  5. लो-लाइंग पोस्टीरियर :- Low-lying posterior :- यदि नाल नीचे की ओर झुकी है, तो डिलीवरी में ब्लीडिंग के खतरे और प्लेसेंटा प्रीविया जैसी जटिलता उत्पन्न हो सकती है।
  6. ट्रामा/चोट :- Trauma/Injury :- गिरना, एक्सीडेंट या दबाव से नाल अलग हो सकती है, जिसका मेडिकल टर्म अब्रप्शन है, जो इमरजेंसी बन सकता है।
  7. बहुत कम में संक्रमण/रुकावट :- Rarely, infection/blockage :- दुर्लभ मामलों में नाल की सही स्थिति न होने से पोषण/ऑक्सीजन आपूर्ति बाधित हो सकती है और कुछ मामलों में संक्रमण का खतरा भी उत्पन्न हो सकता है।

प्लेसेंटा का स्थिति स्थान Position of the placenta

गर्भावस्था के दौरान प्लेसेंटा कभी-कभी ऊपर, साइड या पीछे-नीचे भी खिसक सकता है जो ज्यादातर मामलों में डिलीवरी के समय तक सही स्थान पर आ जाता है। इसलिए समय-समय पर डॉक्टर से जांच और परामर्श आवश्यक होता है।

  1. पोस्टीरियर :- Posterior :- पीठ की ओर हलचल जल्दी महसूस होती है, सामान्य डिलीवरी की संभावना अधिक होती है।
  2. एंटीरियर :- Anterior :- पेट की ओर शिशु की हलचल देर से महसूस हो सकती है और कोई विशेष खतरा नहीं होता है।
  3. फंडल :- Fundal :- गर्भाशय का ऊपरी भाग सबसे सुरक्षित, सभी ओर से स्पेस उपलब्ध है।
  4. लो-लाइंग/प्रीविया :- Low-lying/previa :- गर्भाशय-मुख के पास जटिलता/ब्लीडिंग की संभावना होती है। इसमें विशेष निगरानी की जरूरत होती है।
  5. लैटरल :- Lateral :- दाएँ या बाएँ दीवार सामान्य, और अक्सर इसमें कोई समस्या नहीं होती है।

प्लेसेंटा की सही पोजीशन होनी क्यों जरूरी है? Why is it important for the placenta to be in the correct position?

प्लेसेंटा की सही पोज़ीशन पर होना क्यों जरुरी है। ऐसा इसलिए जरुरी है क्योंकि प्लेसेंटा भ्रूण तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण पहुंचा सके। जब प्लेसेंटा सही जगह पर होता है, तो शिशु का विकास सामान्य रूप से होता है और डिलीवरी (Delivery) भी सेफ हो जाती है।

गलत स्थिति, जैसे लो-लाइंग प्लेसेंटा, डिलीवरी को जटिल यानी कॉम्प्लिकेटेड बना सकती है। खासकर प्लेसेंटा प्रीविया (Placenta Previa) की स्थिति में नॉर्मल यानी वेजाइनल डिलीवरी (vaginal delivery) संभव नहीं होती और डॉक्टर सी-सेक्शन की सलाह दे सकते हैं। इसलिए प्लेसेंटा की सही स्थिति का पता लगाना और प्रेगनेंसी के दौरान इसकी निगरानी करना बेहद महत्वपूर्ण है।

प्लेसेंटा के फायदे Benefits of the placenta

  1. हलचल जल्दी महसूस होती है :- Feeling movement sooner :- पोस्टीरियर प्लेसेंटा होने से मां को शिशु की हरकत जल्दी और स्पष्ट महसूस होती है। इसके कारण मां को अपने बच्चे का अनुभव होता है।
  2. सामान्य प्रसव की संभावना अधिक :- Higher chances of normal delivery :- इस स्थिति में प्लेसेंटा गर्भाशय-मुख से दूर होता है, जिससे आमतौर पर नॉर्मल डिलीवरी (normal delivery) में सुविधा होती है।
  3. बच्चे को बेहतर ग्रोथ का स्थान :- Better growth space for the baby :- शिशु के घूमने और विकास के लिए ज़्यादा जगह मिलती है, जिससे उसका शारीरिक विकास और सक्रियता बढ़ती है।
  4. प्रीविया का जोखिम कम :- Reduced risk of placenta previa :- क्योंकि पोस्टीरियर प्लेसेंटा नीचे नहीं होता, प्लेसेंटा प्रीविया (जहाँ नाल गर्भाशय-मुख ढक लेती है) का जोखिम बहुत कम हो जाता है।

एंटीरियर प्लेसेंटा के लक्षण Symptoms of an anterior placenta

एंटीरियर प्लेसेंटा के आमतौर पर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन कुछ संकेत इसके होने का आभास दे सकते हैं

  1. शिशु की हरकतें देर से महसूस होना अगर गर्भावस्था के दौरान शिशु की किक देर से महसूस हो रही हो, तो यह एंटीरियर प्लेसेंटा के कारण हो सकता है।
  2. पेट के निचले हिस्से में दबाव या असहजता कुछ महिलाओं को पेट के निचले हिस्से में दबाव या बेचैनी महसूस हो सकती है।
  3. शिशु की धड़कन सुनने में कठिनाई: अल्ट्रासाउंड या चेकअप के दौरान डॉक्टर को भ्रूण की धड़कन सुनने में कठिनाई हो सकती है, क्योंकि प्लेसेंटा ध्वनि को रोक सकता है।

प्लेसेंटा की जाँच कैसे की जाती है? How is the placenta checked

  1. अल्ट्रासाउंड स्कैन :- Ultrasound scan :- अल्ट्रासाउंड के जरिए यह देखा जाता है कि प्लेसेंटा की पोजीशन सही है या नहीं, यह ठीक से काम कर रहा है या नहीं। अल्ट्रासाउंड सबसे सुरक्षित और कॉमन तरीका है।
  2. डॉप्लर स्कैन :- Doppler Scan :- डॉप्लर स्कैन के जरिये प्लेसेंटा में ब्लड फ्लो को मापा जाता है, जिससे पता चलता है कि भ्रूण तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण पहुँच रहा है या नहीं।
  3. एक्स्ट्रा टेस्ट :- Extra Tests :- अगर किसी तरह की समस्या दिखाई देती है, तो डॉक्टर प्रेगनेंसी के दौरान और परीक्षण कराने की सलाह दे सकते हैं, ताकि माँ और शिशु दोनों सुरक्षित रहें।

प्लेसेंटा को स्वस्थ कैसे रखें? How to keep the placenta healthy

प्लेसेंटा को स्वस्थ रखने के लिए आपको कुछ बातों का खास ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि:

  1. पौष्टिक आहार लें :- Eat a nutritious diet :- प्लेसेंटा और शिशु के सही विकास के लिए पौष्टिक आहार बेहद जरूरी है। आयरन, फोलिक एसिड और प्रोटीन से भरपूर खाने का सेवन करें। हरी सब्जियाँ, ताजे फल और साबुत अनाज अपनी रोज़मर्रा की डाइट में शामिल करें।
  2. धूम्रपान और शराब से बचें :- Avoid smoking and alcohol :- यह प्लेसेंटा के विकास को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इससे शिशु का वजन कम हो सकता है और अन्य समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।
  3. नियमित व्यायाम करें :- Exercise regularly :- हल्का योग और टहलना प्लेसेंटा को स्वस्थ रख सकता है। अपनी डेली रूटीन में व्यायाम को शामिल करें।
  4. तनाव कम करें :- Reduce stress :- अधिक तनाव प्लेसेंटा के काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए तनाव को मैनेज करें।
  5. चोट या संकुचन :- Injury or contractions :- पेट पर चोट, दबाव या झटका लगने से बचें। लगातार या तेज़ गर्भाशय संकुचन महसूस हो, तो सतर्क रहें।
  6. रक्तस्राव :- Bleeding :- यदि योनि से रक्तस्राव हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें
  7. नियमित डॉक्टर से परामर्श लें :- See your doctor regularly :- प्रेगनेंसी के दौरान समय-समय पर जाँच करवाएँ। शिशु की हरकतें कम महसूस हों या पेट सख्त लगे, या किसी भी असामान्यता पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

परामर्श :- Consultation

गर्भावस्था के प्रारंभ से लेकर बच्चे के जन्म तक प्लेसेंटा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। बच्चे को ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति के साथ ही बच्चे की अशुद्धियां दूर करने का काम भी प्लेसेंटा हीं करता है। प्लेसेंटा हीं भ्रृण और मां को ऐक साथ जोड़ती है।

प्लेसेंटा मां और बच्चे के बीच जीवन का सबसे अहम सेतु है। इसके बिना प्रेगनेंसी की कल्पना ही मुश्किल है। यदि ऐसा नहीं होता है या फिर प्लेसेंटा अपना सामान्य काम नहीं कर पा रहा है, तो शिशु का विकास सही से नहीं हो पाता है, जिसके कारण प्री-टर्म डिलीवरी या गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

जैसे-जैसे आपका गर्भाशय बढ़ता है, प्लेसेंटा ऊपर या साइड में खुद-ब-खुद सरक सकता है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘प्लेसेंटल माइग्रेशन’ कहते हैं।

प्लेसेंटा अगर ‘फंडल’ (ऊपर) या ‘पोस्टीरियर’ है और बच्चेदानी, मुख को नहीं ढंके, तो वह सबसे अच्छी स्थिति मानी जाती है।

अत्यधिक तनाव प्लेसेंटा के काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। प्रेगनेंसी के दौरान खुद को मानसिक रूप से शांत रखने की कोशिश करें।

प्रेगनेंसी के दौरान समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप कराएँ। अगर कोई असामान्यता दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।

कई बार प्लेसेंटा गर्भावस्था के दौरान ऊपर की तरफ खिसक जाता है। लेकिन अगर यह नीचे ही बना रहे, तो डॉक्टर प्रसव के लिए सी-सेक्शन की सलाह दे सकते हैं।

अगर गर्भवती महिलाओं को र्भावस्था के दौरान किसी भी तरह का कोई भी समस्या हो रहा है। तो आपको स्त्री रोग विशेषज्ञ से जरूर सलाह लेना चाहिए। और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए।

कोई भी उपाय करने से पहले स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लें

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को किसी भी प्रकार की कोई भी शारीरिक समस्या हो रही है; तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह ले और अपने आप से किसी भी दवाई का सेवन करने से बचें।

गर्भावस्था के दौरान कोई भी समस्या होने पर किसी भी दवाई , तेल ,जेली या क्रीम का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले।

डॉक्टर द्वारा दिए गए दवाओं का नियमित रूप से सही समय पर सेवन करें।

यह एक सामान्य जानकारी है। अगर आपको पीरियड्स मिस होने या प्रेगनेंसी से जुड़ी किसी भी तरह का कोई भी परेशानी, कारण या लक्षण दिखाइ दे रहे हैं। तो इन लक्षणों को नजर अंदाज न करें या इससे रीलेटेड कोई भी समस्या हो रहा है। तो आपको डॉक्टर से जरूर सलाह लेना चाहिए। और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। और इसका इलाज कराना चाहिए।

Comments

Popular posts from this blog

किशोरावस्था क्या है? What is adolescence?

अपने प्यार को मजबूत बनाने के लिए: कुछ तरीके

लड़की के पीरियड्स क्या होते हैं ?