पीलिया रोग क्यों होता है? कारण लक्षण और इलाज Why does jaundice occur? Causes, symptoms, and treatment
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जॉन्डिस (पीलिया): लक्षण, कारण और उपचार Jaundice: Symptoms, Causes, and Treatment
पीलिया (piliya), जिसे इंग्लिश भाषा में जॉन्डिस (Jaundice) कहा जाता है, जॉन्डिस या पीलिया शरीर में बिलीरुबिन की बढ़ती मात्रा के कारण होता है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बनता है। यह लिवर की बीमारी है और ग्रसित मरीज की त्वचा , आंखों का सफेद हिस्सा और नाखून का रंग पीला होने लगता है। अगर बिलीरुबिन की मात्रा बहुत अधिक हो जाए, तो यह पीलिया का कारण बन सकता है, जिससे लिवर की समस्याएं बढ़ सकती हैं।
पीलिया नवजात शिशुओं से लेकर बुजुर्गों तक किसी भी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर सकता है।
पीलिया कैसे होता है? How does jaundice occur?
लिवर बिलीरुबिन को रक्त से अपशिष्ट पदार्थ के रूप में लेता है और इसकी रासायनिक संरचना को बदलकर इसके अधिकांश भाग को पित्त के माध्यम से मल के रूप में निकाल देता है। बिलीरुबिन, एक पीला-नारंगी पदार्थ है जो लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है। जब ये कोशिकाएं मर जाती हैं या टूट जाती हैं तो इनसे निकलने वाले बिलीरुबिन को लिवर एकत्रित कर फिल्टर करता है। जब लिवर यह काम ठीक से नहीं कर पाता तो शरीर में बिलीरुबिन की मात्रा बढ़ जाती है। इसी अतिरिक्त बिलीरुबिन के कारण पीलिया होता है। बिलीरुबिन के कारण ही पीलिया से ग्रसित मरीज की त्वचा और आंखों का रंग पीला दिखता है।
पीलिया क्यों होता है? - Why does jaundice occur?
पीलिया होने के कई कारण हैं जिन्हें हमने नीचे विस्तार से समझाने का प्रयास किया है -
- लीवर को नुकसान :- Liver damage :- लीवर को कई प्रकार की समस्याएं घेर लेती हैं जैसे हेपेटाइटिस, अल्कोहल संबंधी यकृत रोग, ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस, और अन्य लीवर के रोग। पित्त सिरोसिस (Biliary cirrhosis), हेमोक्रोमैटोसिस (hemochromatosis), और विल्सन रोग (Wilson's disease) लीवर के अन्य रोग हैं।
- पित्त नलिकाओं में रुकावट :- Blockage in the bile ducts :- यदि किसी भी कारणवश पित्त की नलिकाओं में किसी भी प्रकार की रुकावट आती है, जैसे पित्त की पथरी, पित्त नली का ट्यूमर या पैनक्रिएटाइटिस (pancreatitis) तो इसके कारण बिलीरुबिन रक्त प्रवाह में फिर से वापस आ जाता है।
- रेड ब्लड सेल्स का कम होना (हिमोलाइसिस) :- Decreased red blood cells (hemolysis) :- सिकल सेल रोग (Sikkle cells diseases) और अन्य रक्त संबंधित समस्याओं जैसे थैलेसीमिया, ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डिहाइड्रोजनेज की कमी, और कुछ दवाएं भी शरीर में रेड ब्लड सेल्स को कम कर सकती हैं।
- दवाएं और जड़ी-बूटियां :- Medications and herbs :- कुछ दवाएं जैसे एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक और एंटीडिप्रेसेंट के साथ-साथ कुछ जड़ी बूटियां जैसे कवा और चैपारल लीवर को परेशान कर सकती हैं।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऊपर बताए गए लक्षण वयस्कों में अधिक देखने को मिलते हैं। इसके अतिरिक्त यदि आपको या फिर आपके बच्चे को पीलिया की समस्या है, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें और उचित निदान एवं उपचार की योजना पर बात करें।
पीलिया के प्रकार Types of jaundice
- प्री-हिपेटिक पीलिया :- Pre-hepatic Jaundice :- इसमें लाल रक्त कोशिकाएं अत्यधिक मात्रा में टूटती हैं जिससे बिलीरुबिन का निर्माण अधिक मात्रा में होता है। इसके कारण लिवर, बिलीरुबिन को एकत्रित नहीं कर पाता और शरीर में फैलने लगता है। यह अतिरिक्त बिलीरुबिन पीलिया का कारण बनता है।
- पैटोसेलुलर पीलिया :- Patocellular Jaundice :- इस स्थिति में लिवर की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण लिवर बिलीरुबिन को पर्याप्त मात्रा में एकत्रित नहीं कर पाता और बिलीरुबिन सिरोसिस हो जाता है। इसके कारण पित्त-ट्री के इंट्राहेपेटिक भाग में दबाव पड़ता है जो कोशिकाओं में रुकावट का कारण बनता है। इस रुकावट के कारण लिवर कोशिकाएं शिथिल पड़ जाती हैं जो हेपैटोसेलुलर पीलिया का कारण बनती है।यह पैटोसेलुलर पीलिया का अर्थ है |
- पोस्ट-हिपेटिक पीलिया :- Post-hepatic Jaundice :- इस स्थिति में पित्त नलिकाएं छतिग्रस्त हो जाती हैं और उनमें एक प्रकार की सूजन आ जाती है जिससे पित्त नलिकाएं ब्लॉक हो जाती हैं। इसके कारण पित्त, पित्ताशय थैली से पाचनतंत्र तक नहीं पहुंच पाता। यह पोस्ट-हिपेटिक पीलिया का कारण बनता है।
पीलिया होने के कारण due to jaundice
- हेपेटाइटिस :- Hepatitis :- हेपेटाइटिस के कारण पीलिया की शिकायत हो सकती है। यह एक लिवर की बीमारी है जो वायरल इन्फेक्शन, ड्रग्स के इस्तेमाल या ऑटोइम्यून डिजीज के कारण हो सकती है।पीलिया के लक्षणों के साथ साथ इसके कारण भी बहुत आवश्यक होते है |
- लिवर की सूजन :- Liver inflammation :- सूजन के कारण लिवर, बिलीरुबिन को न तो सही तरीके से एकत्रित कर पाता है और न ही शरीर से बाहर निकाल पाता है। इस स्थिति में लिवर में बिलीरुबिन की मात्रा बढ़ने लगती है और पीलिया हो जाता है।
- शराब से संबंधित लिवर की बीमारी :- Alcohol-related liver disease :- शराब पीने के कारण लिवर को नुकसान पहुंच सकता है। शराब के सेवन से लिवर से संबंधित होने वाले रोग अल्कोहलिक हेपेटाइटिस और अल्कोहलिक सिरोसिस हो सकते हैं। इससे पीलिया होने की संभावना होती है।
- हेमोलिटिक एनीमिया :- Hemolytic anemia :- इस स्थिति में शरीर में बड़ी मात्रा में लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बिलीरुबिन का निर्माण होता है और पीलिया की स्थिति निर्मित होती है।
- गिल्बर्ट सिंड्रोम :- Gilbert's syndrome :- यह एक आनुवांशिक विकार है। इस स्थिति में हमारे शरीर में पाए जाने वाले एंजाइम, पित्त को कम मात्रा में फिलटर कर पाते हैं। उनकी फिल्टर करने की क्षमता कम हो जाती है। पीलिया के लक्षणों के साथ साथ इसके कारण भी बहुत आवश्यक होते है |
- पित्त नलिकाओं के ब्लॉकेज :- Blockage of the bile ducts :- ये पतली नलिकाएं होती हैं जो लिवर और पित्ताशय से पित्त को छोटी आंत में ले जाती हैं। ये नलिकाएं गाल स्टोन, कैंसर या लिवर के अन्य गंभीर रोगों के कारण ब्लॉक हो जाती है। इस स्थिति में पीलिया हो सकता है।
- पैंक्रियाटिक कैंसर :- Pancreatic cancer :- यह पित्त नली को बंद कर सकता है और पीलिया का कारण बन सकता है। यह महिलाओं में और पुरुषों में होने वाला सबसे कॉमन कैंसर है।
- दवाओं के कारण :- Medications :- एसिटामिनोफेन, पेनिसिलिन, गर्भनिरोधक गोलियां और स्टेरॉयड लिवर की बीमारी से जुड़ी हैं। यह पीलिया का कारण बन सकती है।
पीलिया के कारण होने वाली दूसरी बीमारियां
- फैटी लिवर :- Fatty liver :- इस स्थिति में लिवर में फैट जमा होने लगता है। यह अनियमित खानपान, फैटी आहार, तनाव, शराब का सेवन करने समेत अन्य कारणों से हो सकता है।
- सिरोसिस रोग :- Cirrhosis :- शराब का सेवन, वसायुक्त भोजन और खराब जीवनशैली के कारण लिवर में रैश बनने लगते हैं। यह रैश कोशिकाओं को ब्लॉक कर देते हैं, इसे फाइब्रोसिस कहते हैं। इस स्थिति में लिवर अपने वास्तविक आकार में ना रहकर सिकुड़ने लगता है।
- लिवर फेल्योर :- Liver Failure :- इस स्थिति में लिवर काम करना बंद कर देता है।
- एक्यूट लिवर फेल्योर :- Acute Liver Failure :- इस स्थिति में मलेरिया, टायफॉइड, हेपेटाइटिस- ए, बी, सी, डी व ई जैसे वायरल, बैक्टीरियल या फिर किसी अन्य रोग से हुए संक्रमण के कारण लिवर की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं।
- क्रोनिक लिवर फेल्योर :- Chronic liver failure :- लिवर की लंबे समय चली आ रही बीमारी के कारण यह स्थिति निर्मित होती है।
पीलिया रोग किसे हो सकता है? Who can get jaundice?
नवजात शिशुओं में पीलिया होने का सबसे अधिक खतरा होता है। 37 सप्ताह या 8.5 महीने से पहले जन्मे शिशु को पीलिया का खतरा अधिक होता है, क्योंकि अब तक उनका लिवर पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाता है। इसके अलावा ऐसे शिशु, जिन्हें मां का दूध पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलता है उन्हें भी इस बीमारी का खतरा होता है। इन सबके अलावा, जिन शिशुओं में सेप्सिस संक्रमण, आंतरिक रक्तस्राव, शिशु में लिवर की समस्या, जन्म के दौरान चोट लगना, शिशु की लाल रक्त कोशिकाओं में समस्या, खून के प्रकार का अलग होना जैसे आरएच रोग और आनुवंशिक समस्या जैसे कि जी6 पीडी की कमी जैसी स्थितियों में पीलिया होने का जोखिम अधिक होता है।
नवजात शिशु में पीलिया Jaundice in a newborn baby
जन्म के समय से ही कई बच्चों में पीलिया होता है। हालांकि इसमें घबराने की कोई बात नहीं होती। यह कुछ दिनों बाद अपने आप ठीक हो जाता है। बच्चों में पीलिया के कई लक्षण दिखाई देतें हैं जैसे उल्टी और दस्त होना, 100 डिग्री से ज्यादा बुखार रहना, पेशाब का रंग गहरा पीला होना, चेहरे और आंखों का रंग पीला पड़ना आदि। बच्चों में पीलिया अधिकतर उनके लिवर के विकसित न होने के कारण होता है। इसके अलावा प्री-मैच्योर बेबी में पीलिया का खतरा अधिक होता है।
पीलिया कितने दिन रहता है How long does jaundice last?
आमतौर पर वयस्को में पीलिया का इलाज उसके लक्षणों व कारणों पर निर्भर करता है। यदि पीलिया तीन हफ्ते या उससे अधिक समय तक बना रहता है तो डॉक्टर को तुरंत दिखाना चाहिए। इसके लक्षण जितने कम दिखेंगे पीलिया उतनी जल्दी ठीक हो सकता है। पीलिया शरीर में बिलिरुबीन का स्तर बढ़ने के कारण होने वाली बीमारी है। स्तनपान करने वाले शिशुओं में पीलिया एक महीने तक रह सकता है। जबकि ऐसे बच्चे जो फॉर्मूला पर होते हैं उनमें पीलिया दो सप्ताह तक रह सकता है।
पीलिया कितने पॉइंट होना चाहिए? How many points should jaundice be?
पीलिया का सामान्य स्तर लगभग 0.2 - 1.0 mg/dL है। यदि रिपोर्ट में यह स्तर 1.0 mg/dL से ऊपर आ जाए, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें और इलाज कराए।
पीलिया के लक्षण Symptoms of jaundice
पीलिया होने पर रोगी को निम्न लक्षणों का अनुभव हो सकता है -
- गहरे रंग का मूत्र: रक्त में बिलीरुबिन की अत्यधिक मात्रा मूत्र को गहरे पीले या भूरे रंग का कर देती है।
- फीके रंग का मल
- आंखों में पीलापन आना
- त्वचा का पीला पड़ना
- थकान और कमजोरी महसूस होना
- पेट दर्द होना = खासकर अगर लीवर या गॉलब्लैडर प्रभावित हो।
- वजन घटना
- भूख न लगना
- बुखार आना
- शरीर में खुजली होना
- मतली और उल्टी होना
एनीमिया और पीलिया के लक्षणों में अन्तर क्या है? What is the difference between the symptoms of anemia and jaundice?
- एनीमिया रोग में रोगी का रंग सफेद-पीला हो जाता है, लेकिन पीलिया में रोगी की त्वचा, आंख, नाखून और मुंह का रंग हल्दी की तरह पीला हो जाता है।
- एनीमिया खून की कमी के कारण होता है, लेकिन पीलिया में पित्ताशय से निकलने वाला पित्त, खून में मिलकर पूरे शरीर में फैलता है।
- एनीमिया में भूख लगती है, लेकिन पीलिया में भूख नहीं लगती है।
- एनीमिया लाल रक्त कोशिकाओं में कमी है। एनीमिया कई चीजों के कारण हो सकता है लेकिन सोचने का एक आसान तरीका यह है कि या तो यह उत्पादन में कमी या विनाश में वृद्धि के कारण होता है। पीलिया बिलीरुबिन में वृद्धि है। बिलीरुबिन हीमोग्लोबिन का एक उपोत्पाद है, जो लाल रक्त कोशिकाओं और अन्य प्रोटीन में मौजूद होता है। बिलीरुबिन को लीवर की मदद से संसाधित और उत्सर्जित किया जाता है।एनीमिया और पीलिया के लक्षणों में अन्तर बहुत से होते है जो मुख्य रूप से हर कोई नहीं जानते है
- लाल रक्त कोशिकाओं का स्तर बढ़ जाता है, तो हीमोग्लोबिन भी बढ़ जाता है जिसके परिणामस्वरूप बिलीरुबिन उत्पादन बढ़ जाता है। यह बिलीरुबिन को संसाधित करने की यकृत की क्षमता को प्रभावित कर सकता है और इसके परिणामस्वरूप रक्त में बिलीरुबिन बढ़ सकता है और बदले में पीलिया हो सकता है।
- एनीमिया के लक्षणों में थकान, त्वचा का पीलापन, सांस फूलना, सिर घूमना, चक्कर आना, या दिल की तेज़ धड़कन शामिल हो सकते हैं। कई लोगों को अच्छा महसूस न करना, चक्कर आना, थकान, या सिर घूमना, दिल की तेज़ धड़कन या धकधकी, त्वचा का पीलापन, नाज़ुक नाखून, सांस फूलना, या सिरदर्द होने जैसे लक्षण भी मिलेंगे।
पीलिया कब खतरनाक होता है? - When is jaundice dangerous?
पीलिया की समस्या निम्न स्थितियों में खतरनाक साबित हो सकती है
- नवजात शिशुओं में पीलिया की समस्या अधिक गंभीर होती है।
- पित्त नकिलाओं में रुकावट बहुत ज्यादा हो।
- त्वचा का गहरा पीले रंग का होना भी बिलीरुबिन स्तर के बढ़ने का संकेत देता है।
- मल और मूत्र के रंग में लंबे समय से बदलाव
- आंखों के रंग में बदलाव
इसके साथ-साथ निम्न स्थितियों के साथ-साथ पीलिया होने पर तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें और इलाज कराए।
- प्रेगनेंट होने की स्थिति में
- स्तनपान करने की स्थिति में
- 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र
- डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएं
- कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली
- कैंसर की फैमिली हिस्ट्री
पीलिया का शरीर पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव Negative effects of jaundice on the body
- लिवर इन्फेक्शन
- पित्ताशय या अग्न्याशय की समस्या
- लाल रक्त कोशिकाओं का अधिक मात्रा में टूटकर लिवर में प्रवेश करना
- बिलीरुबिन का पाचन तंत्र में न पहुंचना
- वायरस या परजीवी जिससे लिवर का संक्रमण हो सकता है
- रक्त से संबंधित विकार
- पैंक्रायटिक कैंसर
- क्रोनिक लिवर की बीमारी
- गर्भावस्था के समय होने वाला पीलिया
पीलिया के लिए कौन सा टेस्ट होता है? What test is done for jaundice?
पीलिया के लिए टेस्ट Tests for jaundice
- शारीरिक परीक्षा डॉक्टर त्वचा और आंखों के रंग की जांच करते हैं और पेट का निरीक्षण करते हैं।
- बिलीरुबिन टेस्ट
- कम्प्लीट ब्लड काउंट टेस्ट (CBC)
- हेपेटाइटिस ए, बी और सी की जांच
- एमआरआई स्कैन
- अल्ट्रासाउंड
- सीटी स्कैन
- एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलैंजियोंपैंक्रिटोग्राफी
- लिवर बायोप्सी
पीलिया का इलाज Treatment of jaundice
पीलिया का इलाज उसके कारण पर निर्भर करता है। पीलिया की शुरुआती स्टेज में इसके कोई लक्षण नहीं दिखते। इसकी वजह यह है कि यह खुद में एक बीमारी नहीं बल्कि यह कई अन्य गंभीर बीमारियों के कारण होता है। पीलिया के कुछ मामलों में इसके खास इलाज की जरूरत नहीं होती। इन्हें सामान्य उपचार और अपने आहार में बदलाव करके ठीक किया जा सकता है। जबकि इसकी सीरियस स्टेज में मरीज को हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ता है। डॉक्टर इलाज के जरिए इसे ठीक करते है।
पीलिया का उपचार Treatment of jaundice
जैसे हीं पीलिया (Jaundice) के लक्षण दिखे सबसे पहले जाँच करवाए जिसके लिए डॉक्टर के पास जाकर जो लक्षण है वो सही से बताये और इसके अतिरिक्त लिवर फंक्शन टेस्ट (Liver Function Test), बिलीरुबिन स्तर और कंपलीट ब्लड काउंट (CBC) टेस्ट भी करवाए ।
पीलिया का जो इलाज है वो उसके होने वाले कारणों पर निर्भर करता है । यहाँ कुछ सामान्य उपचार विकल्प हैं
- फिजिकल एग्जामिनेशन :- Physical Examination :- के दौरान डॉक्टर कुछ प्रश्न पूछते हैं, जिससे वह स्थिति के दौरान उत्पन्न हो रहे लक्षणों की पुष्टि कर लेते हैं।
- हेमोलिटिक पीलिया का उपचार :- Treatment of Hemolytic Jaundice :- रक्त संक्रमण संक्रमण के इलाज के लिए, एंटीवायरल या एंटीबायोटिक दवाओं की आवश्यकता पड़ती है।स्टेरॉयड और इम्यूनोग्लोबुलिन कुछ मामलों में, स्टेरॉयड और इम्यूनोग्लोबुलिन थेरेपी का उपयोग किया जा सकता है।
- हेपेटिक पीलिया का उपचार :- Treatment of Hepatic Jaundice :- एंटीवायरल दवाएं: हेपेटाइटिस के मामलों में, एंटीवायरल दवाओं का उपयोग किया जाता है।लिवर ट्रांसप्लांट: गंभीर लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर के मामलों में लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता हो सकती है।
- ऑब्स्ट्रक्टिव पीलिया का उपचार :- Treatment of Obstructive Jaundice :- सर्जरी: बाइल डक्ट के अवरोध को दूर करने के लिए सर्जरी भी की जाती है।एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलेन्जियोपैनक्रिएटोग्राफी (ERCP) इस प्रक्रिया का उपयोग बाइल डक्ट में स्टेंट डालने या पत्थरों को निकालने के लिए किया जाता है।
- संक्रमण का इलाज :- Treatment of infection :- संक्रमण के इलाज के लिए, एंटीवायरल या एंटीबायोटिक दवाओं की आवश्यकता पड़ती है।
पीलिया से बचने के उपाय Ways to prevent jaundice
- डाइट में दूध शामिल करें और नियमत दूध पिएं।
- कम से कम 8 गिलास पानी पिएं।
- हाई फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल करें।
- सुरक्षित और स्वस्थ भोजन व साफ पानी का सेवन करें।
- संक्रमण के दौरान वसायुक्त और तेल से बने खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
- अच्छी तरह से हाइड्रेटेड रहने के लिए तरल पदार्थों का सेवन करें।
- कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य पदार्थों के साथ पाचन को बेहतर बनाने वाले फलों को डाइट में शामिल करें।
- शराब न पिएं।
- हेपेटाइटिस के टीके लगवाएं।
- नशीली दवाओं का उपयोग न करें।
- असुरक्षित यौन संबंध से बचें।
नवजात शिशुओं में पीलिया बहुत आम बात है। आमतौर पर नवजात शिशुओं में पीलिया होने का खतरा ज्यादा होता है। हालांकि, यह बच्चे में एक से दो सप्ताह के भीतर अपने आप आसानी से ठीक हो जाता है। अगर पीलिया का स्तर ऊंचा होता है। तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें और इलाज कराए।
पीलिया को ठीक जल्दी कैसे करें? How to cure jaundice quickly?
पीलिया को ठीक करने के कई तरीके हैं जैसे -
- पीलिया के कारण का इलाज करें।
- स्वस्थ आहार लें।
- आराम करें।
- तरल पदार्थों का सेवन बढ़ाएं।
- धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें।
कुछ घरेलू उपचार हैं, Some home remedies are,
डाइट में बदलाव करके भी स्थिति में बहुत मदद मिल सकती है।
लेकिन पीलिया में क्या खाना चाहिए? यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पीलिया का इलाज सिर्फ डाइट चेंज से नहीं हो सकता है। इस स्थिति के इलाज के लिए डाइट एक सहायक इलाज के विकल्प के तौर पर मदद कर सकता है। यदि आपको पीलिया है, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। और इसका इलाज कराना चाहिए।
हालांकि, कुछ घरेलू उपचार हैं, जो पीलिया के लक्षणों को कम करने और लीवर के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं जैसे -
- फलों और सब्जियों का सेवन से लाभ मिलेगा क्योंकि इसमें विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं। खट्टे फलों को अपने आहार में आवश्यक रूप से शामिल करें।
- हरी सब्जियां जैसे पालक, मेथी और धनिया का सेवन बिलीरुबिन के टूटने में मदद करता है।
- होल ग्रेन्स के साथ दाल, नट्स, और बीज का सेवन लाभकारी होगा।
- दही प्रोबायोटिक्स से भरपूर होता है, जिससे खाना पचाने में मदद मिलती है।
- हल्दी एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होता है, इसलिए इसे भी अपना आहार में शामिल करें।
नवजात शिशुओं में पीलिया के उपचार Treatment of jaundice in newborns
नवजात शिशुओं में पीलिया एक सामान्य चिकित्सीय स्थिति है, जिसे नवजात पीलिया भी कहा जाता है। यह सामान्यतः जन्म के पहले सप्ताह में देखा जाता है और अधिकतर मामलों में यह अपने आप हीं समान्य देखभाल से ठीक हो जाता है। हालांकि, कुछ मामलों में, इलाज की आवश्यकता हो सकती है:
- फोटोथेरेपी: नवजात शिशुओं में पीलिया का इलाज करने के लिए फोटोथेरेपी का उपयोग किया जाता है, जिसमें विशेष नीली रोशनी का उपयोग करके बिलीरुबिन को तोड़ा जाता है।
- इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन (IVIG): गंभीर मामलों में, IVIG थेरेपी का उपयोग किया जा सकता है।
- ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन: बहुत ही गंभीर मामलों में, ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता हो सकती है।
नवजात शिशुओं में पीलिया के कुछ घरेलू नुस्खे Some home remedies for jaundice in newborn babies
जन्म के समय बच्चे को पीलिया (jaundice) होना सामान्य बात है। हालांकि, इसके उपचार के कई तरीके हैं,जिन्हें आप नवजात शिशुओं में पीलिया के इलाज के लिए आजमा सकते हैं-
शिशु को बार-बार स्तनपान कराएं :- Breastfeed your baby frequently :- यदि आपके नवजात शिशु को पीलिया है, तो उसे बार-बार दूध पिलाएं। नवजात शिशु को बार-बार स्तनपान कराने से रक्तप्रवाह बढ़ता है और बिलीरुबिन के मल और मूत्र के जरिए बाहर निकालने में मदद मिलती है। बता दें कि पीलिया होने पर बच्चे बहुत सोते हैं। अगर आपके बच्चे को पीलिया है, तो वह भी बहुत सो सकता है। लेकिन उसे दूध पिलाने या खाने के लिए नियमित समय जगाएं।
मां को भी लेना चाहिए स्वस्थ आहार :- Mothers should also eat a healthy diet :- इसके अलावा जो मां नवजात शिशुओं को स्तनपान कराती है उन्हें हेल्दी डाइट को फॉलो करना चाहिए। मां को अपने आहार में ताजा, पौष्टिक, संतुलित भोजन शामिल करना चाहिए। इसके लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, सप्ताह में एक बार सी फूड, हेल्दी फैट वाले खाद्य पदार्थ, सीड्स, नट्स, फल, मांस और फाइबर युक्त आहार खाएं। एक्सपर्ट का मानना है कि मां जब अपने बच्चे को स्तनपान कराती है, तब दोनों की स्कीन एकदूसरे के संपर्क में आती है। इससे भी बिलीरूबिन का स्तर घटता है।
परामर्श :- Consultation :-
जॉन्डिस एक सामान्य स्थिति है, लेकिन इसे हल्के में न लें। यदि आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को जॉन्डिस के लक्षण दिखाई देते हैं, तो इलाज के लिए डॉक्टर से संपर्क करें। समय पर डॉक्टर से सलाह लेना स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ने से रोकने में मदद करता है
पीलिया(Jaundice) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बिलीरुबिन, पीले-नारंगी पित्त वर्णक के उच्च स्तर के कारण त्वचा, आंखों का सफेद भाग और श्लेष्मा झिल्ली पीली हो जाती है। पीलिया के कई कारण होते हैं,
अगर आपको किसी भी तरह का कोई भी समस्या हो रहा है तो आपको डॉक्टर से परामर्श जरूर लेना चाहिए।
शारीर में कोई भी परेशानी हो रहा है तो कोई भी उपाय करने से पहले डॉक्टर से परामर्श जरूर लें और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लें
किसी भी प्रकार की कोई भी शारीरिक समस्या हो रही है; तो तुरंत डॉक्टर से सलाह ले और अपने आप से किसी भी दवाई का सेवन करने से बचें।
कोई भी समस्या होने पर किसी भी दवाई , तेल ,जेली या क्रीम का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले |
यह एक सामान्य जानकारी है अगर आप किसी भी बीमारी से ग्रसित हैं या कोई भी परेशानी, कारण या लक्षण दिखाइ दे रहे हैं तो इन लक्षणों को नजर अंदाज न करें या इससे रीलेटेड कोई भी समस्या हो रहा है तो आपको डॉक्टर से जरूर सलाह लेना चाहिए। और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। और इसका इलाज कराना चाहिए
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