​बच्‍चों की हाइट बढ़ाने के तरीके Ways to increase the height of children

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बच्चों की हाइट नहीं बढ़ने के कारण / बच्चों की हाइट बढ़ाने के नेचुरल तरीके Reasons for children not growing in height / Natural ways to increase children's height लड़के और लड़कियों की लंबाई किस उम्र तक बढ़ती है? Till what age do boys and girls grow in height? आज के समय में हर कोई अच्छी हाइट पाना चाहता है, क्योंकि लंबाई न केवल व्यक्तित्व को आकर्षक बनाती है, बल्कि आत्मविश्वास को भी बढ़ाती है। यहां जानिए, लड़के और लड़कियों की लंबाई कब तक बढ़ती है? जन्म के बाद बच्चों के सही विकास की जिम्मेदारी माता-पिता की होती है। किसी भी बच्चे की शारीरिक संरचना कैसे होगी यह पूरी तरह से माता-पिता पर निर्भर करता है। अक्‍सर पेरेंट्स शिकायत करते हैं कि उनके बच्‍चे की हाइट नहीं बढ़ रही है या अपने साथ के बच्‍चों के मुकाबले उनके बच्‍चे की हाइट कम है। आजकल तो बच्‍चों की हाइट न बढ़नी या कम बढ़ने की प्रॉब्‍लम ज्‍यादा देखी जा रही है। कम हाइट होने की वजह से बच्‍चों के आत्‍मविश्‍वास में कमी आती है और वो लोगों के सामने जाने से भी कतराने लगते हैं। बच्‍चों के सही मानसिक विकास के लिए उचित शारीरिक विकास होना भी जरूरी ह...

अपनी डिलीवरी डेट कैसे पता करें How to find out your delivery date

अपनी डिलीवरी डेट कैसे पता करें How to find out your delivery date

प्रेगनेंसी नौ महीने या फिर यूँ कहें की 40 सप्ताह की एक खूबसूरत प्रक्रिया है जो यह एक महिला को मां बनने का सुख प्रदान करती है। इस नौ महीने के दौरान गर्भवती महिला के अंदर ढेरों बदलाव आते हैं। जैसे जैसे समय आगे बढ़ता है वह गर्भ में पल रहे शिशु से उतना ही ज्यादा जुड़ाव महसूस करती हैं और अपने शिशु को लेकर कई तरह के सपने संजोती हैं। इसी दौरान उनके मन में एक प्रश्न भी आता है की इनकी डिलीवरी डेट क्या है या फिर इनका शिशु कौन से महीने में कब जन्म लेने वाला है।

हैलो फ्रेंड्स!

मैं { DR MD GYASUDDIN } { डॉक्टर मोहम्मद ग्यासुद्दीन }

मैं आप लोगों को हेल्थ से जुड़ी जानकारियां इस लेख (आर्टिकल) के जरिये देता हूं। मेरे इस पोस्ट से आपको कुछ मदद मिले यही मेरा लक्ष्य है हमारा उद्देश्य है कि आपको इस विषय की पूरी जानकारी मिले और अगर आप या आपका कोई करीबी इस स्थिति से गुजर रहा है, तो आप बेहतर तरीके से इसका सामना कर सकें। तो अगर आपको मेरा लेख ( आर्टिकल ) अच्छा लगे तो फॉलो जरूर करें।

आइए जानते हैं, क्या, क्यों, कैसे होता है। कारण, लक्षण और उपचार के बारे में इत्यादि।

प्रेगनेंसी होने के बाद हर महिला के मन में यह प्रश्न कहीं न कहीं आता ही है की उनका नन्हा मेहमान इस दुनिया में कब आने वाला है। प्रसव की संभावित तारीख या डिलीवरी डेट क्या है। डिलीवरी डेट का पता लगाना काफी आसान है और इसके लिए आपको ज्यादा परेशान होने की जरूरत भी नहीं है। आमतौर पर प्रसव की संभावित तारीख निकालने के लिए आपके पिछले मासिक धर्म के पहले दिन में 280 दिन या 40 सप्ताह जोड़ दिए जाते हैं।

यहां आपको इस बात का ध्यान रखना है की आपके पीरियड्स और ओव्यूलेशन को प्रेगनेंसी के पहले दो सप्ताह के तौर पर गिना जाता है। अगर आपके शिशु का जन्म 40वें सप्ताह में बताई हुई तारीख पर होता है तो वह 40 सप्ताह का नहीं बल्कि 38 सप्ताह का होगा।

डिलीवरी डेट क्या है what is the delivery date

जिस डेट पर आपके शिशु के जन्म की संभावना की जाता है उसे डिलीवरी डेट यानी की प्रसव की नियत तारीख कहा जाता है। यह आपके गर्भधारण के पहले दिन से बिलकुल 38 सप्ताह के बाद की होती है। लेकिन कई बार आपकी शारीरिक परिस्थिति, शिशु के विकास या दूसरे कारणों की वजह से डॉक्टर आपकी डिलीवरी डेट में बदलाव भी कर सकते हैं।

आपकी डिलीवरी डेट की मदद से डॉक्टर को काफी चीजों का फैसला करने में मदद मिलती है। इसमें डिलीवरी से पहले परीक्षण का समय तय करना, भ्रूण का अनुमान लगाना और सबसे खास, डिलीवरी की डेट निकल जाने पर क्या एक्शन लेना या नहीं लेना है आदि तय करना शामिल है।

यहां इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है की डिलीवरी डेट मात्र एक संभावित तारीख होती है। ऐसा जरूरी नहीं है की आपके शिशु का जन्म इसी तारीख को होगा। शिशु का जन्म डिलीवरी डेट से पहले या बाद में भी हो सकता है क्योंकि हर महिला की प्रेगनेंसी अलग अलग होती है

कई बार शिशु का विकास डिलीवरी डेट को तय करता है। शिशु के स्वस्थ और वजनदार होने की स्थिति में आपकी डिलीवरी डेट कुछ दिन पहले भी सकती है। जैसे जैसे आपकी प्रेगनेंसी का समय आगे बढ़ता है, डॉक्टर शिशु के विकास को अल्ट्रासाउंड के जरिए देखते रहते हैं ताकि आप या आपके शिशु को किसी तरह की कोई परेशानी होने से पहले ही उसे रोका जा सके।

डिलीवरी डेट कैसे पता करते हैं How to find out the delivery date

डिलीवरी डेट का अनुमान लगाने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। डॉक्टर अलग अलग विधियों के इस्तेमाल से इसका पता लगाते हैं। लेकिन कुछ विधियां कॉमन हैं जिनके बारे में हम बात कर रहे हैं।

नैजेल का नियम Naegele's law

डिलीवरी डेट का पता लगाने के लिए नैजेल के नियम को काफी प्रभावशाली माना जाता है। यह नियम जर्मन की प्रसूति विशेषज्ञ फ्रांज कार्ल नैजेल के नाम पर रखा गया है। इस नियम के अनुसार, एक मासिक धर्म 28 दिनों के लिए होता है और प्रेगनेंसी 280 दिनों की होती है। इसका मतलब यह हुआ की आपकी आखिरी मासिक धर्म के पहले दिन में 280 दिन यानी की नौ महीने और 7 दिन जोड़कर आपकी डिलीवरी डेट का अनुमान काफी आसानी से पता लगाया जा सकता है।

लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है की अगर आपका मासिक धर्म छोटा है। जैसे की 27 दिन का तो आपको एक दिन कम जोड़ना होगा, यानी की 9 महीने और 6 दिन और अगर आपका मासिक चक्र लंबा है तो फिर आपको एक्स्ट्रा दिन जोड़ना पड़ेगा। इस विधि का इस्तेमाल करने समय अगर आपको किसी तरह की कोई दिक्कत आती है तो आप डॉक्टर से मिलकर मदद ले सकती हैं।

प्रेगनेंसी व्हील pregnancy wheel

प्रेगनेंसी व्हील को एक गर्भ कैलकुलेटर के रूप में भी जाना जाता है। यह डिलीवरी डेट का अनुमान लगाने का बेहतरीन तरीका है। ज्यादातर डॉक्टर इस विधि का इस्तेमाल करते हैं। अगर आपको अपनी प्रेगनेंसी व्हील के बारे में पता है तो आप इसकी मदद से बहुत ही आसानी से अपनी डिलीवरी डेट का पता लगा सकती हैं। प्रेगनेंसी व्हील एक छोटा सा कैलेंडर हैं जो आपके आखिरी मासिक धर्म (एलएमपी) की मदद से आपकी डिलीवरी डेट निर्धारित करने में मदद करता है।

प्रेगनेंसी व्हील पर सबसे पहले आप अपनी आखिरी मासिक चक्र की तारीख का पता लगाती हैं। फिर जब आप उस स्थिति को इंडिकेटर से जोड़ती हैं तो व्हील आपकी डिलीवरी डेट को दिखाता है। लेकिन याद रखें की आपकी डिलीवरी डेट मात्र एक अनुमान है जो इस बात की ओर इशारा करती है की आपका शिशु इस तारीख को जन्म लेगा। यह निश्चित नहीं है की आप उसी दिन अपने शिशु को जन्म देंगी। क्योंकि ऐसा होने की संभावना वास्तव में काफी कम होती है।

गर्भधारण की तारीख date of conception

इस विधि को आखिरी मासिक धर्म विधि (एलएमपी) के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रक्रिया की मदद से आपकी डिलीवरी डेट का अनुमान लगाने के लिए आपके गर्भधारण की तारीख का पता लगाया जाता है। इस विधि के अनुसार ज्यादातर महिलाओं का मासिक धर्म 28 दिनों का होता है और ओव्यूलेशन के प्रक्रिया 14वें दिन या फिर उसके आस पास होती है।

डिलीवरी डेट का अनुमान लगाने के लिए इस विधि का इस्तेमाल करते समय उस तारीख में 40 सप्ताह जोड़े जाते हैं जिस तारीख को आपका आखिरी मासिक धर्म हुआ था। अब इस तारीख से आप डिलीवरी डेट की तारीख प्राप्त करने में दो सप्ताह का समय कम कर दें। क्योंकि यह ओव्यूलेशन का समय है जो आपकी आखिरी मासिक धर्म के बाद शुरुआती दो सप्ताह के अंदर है।

डिलीवरी डेट एक अनुमान है जिसके सच होने की संभावना 5% से भी कम होती है। लेकिन इतना जरूर है की अनुमानित तारीख के आगे पीछे आप अपने शिशु को जन्म देती हैं। अपनी डिलीवरी डेट पर पूरी तरह से निर्भर होकर अपने या अपने शिशु के लिए प्लानिंग करने से बचना चाहिए। कई बार आपकी सेहत, शिशु के विकास या दूसरे कई कारणों की वजह से डॉक्टर आपकी डिलीवरी डेट को आवश्यकता के अनुसार घटाते या बढ़ाते हैं।

डिलीवरी डेट जब भी हो, प्रेगनेंसी के दौरान आपको खुद के साथ साथ अपने शिशु का ख्याल रखना चाहिए। डॉक्टर द्वारा बताई गई चीजों का पालन करना चाहिए। आपके शिशु की सेहत आपके सेहत पर निर्भर करती है इसलिए खुद को फ्रेश, एक्टिव और सेहतमंद रखने की कोशिश करें। किसी भी तरह की कोई भी समस्या होने पर आप तुरंत डॉक्टर से मिलें और डॉक्टर से परामर्श जरूर लें

परामर्श Consultation

अगर गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह का कोई भी समस्या हो रहा है। तो आपको स्त्री रोग विशेषज्ञ से जरूर सलाह लेना चाहिए। और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए।

कोई भी उपाय करने से पहले स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लें

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को किसी भी प्रकार की कोई भी शारीरिक समस्या हो रही है; तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह ले और अपने आप से किसी भी दवाई का सेवन करने से बचें।

गर्भावस्था के दौरान कोई भी समस्या होने पर किसी भी दवाई , तेल ,जेली या क्रीम का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले।

डॉक्टर द्वारा दिए गए दवाओं का नियमित रूप से सही समय पर सेवन करें।

यह एक सामान्य जानकारी है। अगर आपको पीरियड्स मिस होने या प्रेगनेंसी से जुड़ी किसी भी तरह का कोई भी परेशानी, कारण या लक्षण दिखाइ दे रहे हैं। तो इन लक्षणों को नजर अंदाज न करें या इससे रीलेटेड कोई भी समस्या हो रहा है। तो आपको डॉक्टर से जरूर सलाह लेना चाहिए। और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। और इसका इलाज कराना चाहिए।

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