गर्भ में पलने वाले शिशु से बात करना Talking to your baby in the womb
गर्भ में पलने वाले शिशु से बात करना (गर्भ संवाद) Talking to the Baby in the Womb (Womb )
गर्भ में पल रहे शिशु के साथ बातचीत करना Talking to your baby in the womb
गर्भवती महिला को अपने गर्भ में पल रहे शिशु के साथ बातचीत करनी चाहिए। इससे बच्चे-मां का रिश्ता गहरा गर्भवती महिला गर्भ में पल रहे अपने शिशु से बात करती है। इससे शिशु के विकास पर बहुत गहरा असर पड़ता है। वह मानसिक रूप से बेहतर इंसान बनता है और मजबूत होता है और घर के संस्कार उसे गर्भ में ही मिल जाते हैं। इस तरह देखा जाए तो गर्भ में अपने बच्चे से हर गर्भवती महिला को बातें करनी चाहिए।
हैलो फ्रेंड्स!
मैं { DR MD GYASUDDIN } { डॉक्टर मोहम्मद ग्यासुद्दीन }
मैं आप लोगों को हेल्थ से जुड़ी जानकारियां इस लेख (आर्टिकल) के जरिये देता हूं। मेरे इस पोस्ट से आपको कुछ मदद मिले यही मेरा लक्ष्य है हमारा उद्देश्य है कि आपको इस विषय की पूरी जानकारी मिले और अगर आप या आपका कोई करीबी इस स्थिति से गुजर रहा है, तो आप बेहतर तरीके से इसका सामना कर सकें।
आइए जानते हैं, क्या, क्यों, कैसे होता है। कारण, लक्षण और उपचार के बारे में इत्यादि।
प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली मां और गर्भ में पलने वाले शिशु का एक गहरा रिश्ता होता है। अब तक हुई कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि गर्भ में पलने वाले शिशु न सिर्फ मां द्वारा किए गए एहसास को समझ पाते हैं, बल्कि मां की आवाज, उसका स्पर्श और उसकी भावनाओं का बच्चे पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए, प्रेग्नेंसी के दौरान बच्चे से बात करना न केवल उसके दिमागी विकास में सहायक होता है, इससे बच्चे और मां के बीच एक खास कनेक्शन बनता है।
गर्भ संवाद क्या है? What is womb dialogue?
गर्भ में पल रहा शिशु होने वाले माता पिता के लिए किसी वरदान से कम नहीं होता। माँ जब से शिशु को गर्भ में धारण करती है, उस क्षण से ही वह न जाने अपने शिशु के लिए कितने सपने देखने लगती है। उसके मन में अपने होने वाले शिशु की जैसे एक छवि सी बन जाती है। माँ ही नहीं पिता और घर के अन्य सदस्यों की भी होने वाले शिशु के लिए में बहुत सारी अपेक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं बन जाती है। हर कोई चाहता है कि उसके परिवार में जन्म लेने वाला शिशु गुणी, संस्कारी और अच्छे आचरण वाला हो। पर क्या आप जानतें हैं कि आप जैसा शिशु चाहते हैं वैसे ही शिशु को जन्म दे सकते हैं? जी हाँ, ये कोई भ्रम नहीं बल्कि सच है। और इस सच का नाम है गर्भ संस्कार। गर्भ संस्कार की मदद से आप अपने होने वाले शिशु में मनोवांछित गुणों का संवर्धन कर सकती हैं। बात जब गर्भ संस्कार की होती है तो इसका एक अभिन्न अंग की भी चर्चा करना महत्वपूर्ण है | और वह है ‘गर्भ संवाद’। गर्भ संवाद का अर्थ होता है, गर्भस्थ शिशु से संवाद। यानी की अपने होने वाले शिशु से बातचीत करना। इस प्रकिरिया में माँ अपने होने वाले शिशु से बातचीत करती है जिसके परिणाम स्वरूप शिशु और माँ का भावनात्मक सम्बंध सुदृद होते हैं साथ ही होने वाले शिशु में अनोवांछित गुणों का रोपण भी शुरू होता है।
क्यों किया जाता है गर्भ संवाद ? Why is Garbha Samvad done
शिशु के 80% दिमाग का विकास गर्भ में ही हो जाता है। गर्भ धारण के कुछ समय बाद से ही शिशु अपने आस-पास होने वाली आवाज़ों को सुन कर कई चीज़ों को सीख सकतें है। जब शिशु गर्भ से ही इतना कुछ सीख और समझ सकता है जब होने वाली माँ अपने होने वाले शिशु से भावनात्मक संवाद स्थापित करती हैं तो उनके शरीर में ओक्सीटोसिन नामक हॉर्मोन का स्त्राव होता है जिससे उन्हें ख़ुशी का व सकारतमकता का अनुभव होता है जो गर्भस्थ शिशु में भी परिलक्षित होता है | यही प्रसन्नता व सकारतमकता गर्भावस्था व गर्भस्थ शिशु के स्वस्थ विकास में अत्यंत सहायक होती है |
गर्भ में पलने वाले शिशु से बात करना कब शुरू करें? When should I start talking to my unborn baby
प्रेग्नेंसी के चौथे या पांचवें महीने में गर्भ में पलने वाले बच्चे के सुनने की क्षमता विकसित होने लगती है। इस समय से वह मां की आवाज और अन्य बाहरी ध्वनियों को महसूस करने लगता है। महिला के गर्भधारण के 18वें सप्ताह के बाद गर्भस्थ शिशु मां की आवाज को महसूस करने लगता है और 25 वें सप्ताह के बाद मां व उसके आसपास के लोग क्या बात कर रहे हैं, उसे सुनने लगता है। प्रेग्नेंसी के 18वें सप्ताह के बाद से गर्भस्थ शिशु से बात करना शुरू कर देना चाहिए। इस समय की गई बातचीत और संवाद बच्चे के दिमागी विकास के लिए फायदेमंद होती है।
बच्चा कब से सुनने लगता है When does a child start hearing?
गर्भ में पल बच्चा जब 26 से 30 सप्ताह का हो जाता है, तभी से वह बाहर की आवाजें सुनने-समझने और पहचानने लगता है। अगर कोई बच्चे से बात करता है, तो वे उस पर प्रतिक्रिया भी देते हैं। आमतौर पर बच्चे सबसे ज्यादा अपनी मां की आवाज को पहचानते हैं। मां की आवाज सुनने से बच्चे का मन खुश रहता है। इससे बच्चे का विकास भी बेहतर तरीके से होता है। साथ ही मां द्वारा किए जा रहे से संवाद के कारण वह मां के साथ एक गहरा रिश्ता महसूस करने लगता है।
बच्चे से किस तरह बातचीत करें How to talk to a child
जैसा कि आपने जाना कि 26 से 30 सप्ताह के बाद से बच्चा बाहरी आवाज को सुनने-समझने लगता है और बातों पर प्रतिक्रिया करना सीख लेता है। ऐसे में मां के लिए यह जिम्मेदारी बनती है कि वह गर्भमें पल रहे अपने शिशु के साथ बातचीत करते वक्त सतर्क रहे।
गर्भावस्था की इस समयावधि में शोर-शराबे वाली जगह न जाएं। उस दौरान जोर आवाज में बातचीत न करें अगर बच्चा गर्भ में ज्यादा मूवमेंट कर रहा है, जिस वजह से मां सो नहीं पा रही है, तो इस स्थिति में मां अपने शिशु से बातचीत कर सकती है और उसे अच्छे और प्यारे गाने सुना सकती है। इससे बच्चा शांत हो जाता है और मां को भी सोने में मदद मिलती है।
गर्भ में पलने वाले शिशु से कैसे करें बात? How to talk to the baby in the womb
गर्भ में पलने वाले शिशु से बात करने का कोई खास तरीका नहीं है, लेकिन आप इसके लिए नीचे बताए गए टिप्स को जरूर फॉलो कर सकते हैंः
- कहानियां सुनाएं :- Tell stories :- धीरे धीरे अपने शिशु को प्यार से सेहलातें हुए, गर्भ संवाद की शुरुआत करें। गर्भ में पलने वाले शिशु से बात करने सबसे खास तरीका है, उसे अपनी दिनभर की कहानियां सुनाएं। आपने दिन में क्या-क्या किया, आपको क्या अच्छा लगा इसके बारे में गर्भस्थ शिशु को बताएं। आपकी आवाज शिशु के लिए एक आरामदायक माहौल बनाती है और भाषा पहचान विकसित करने में मदद करती है।
- हल्का संगीत बजाएं :- Play soft music :- शिशु से बात करने के लिए कमरे में हल्का संगीत या कोई धुन बजाने की कोशिश करें। कोमल धुनें आपके शिशु को आराम पहुंचा सकती हैं। संगीत से शिशु की भावनाओं और मस्तिष्क कनेक्शन पर भी पॉजिटिव इफेक्ट पड़ता है। ऐसा करने से गर्भस्थ शिशु का दिमागी विकास तेजी से होता है
- धीरे से स्पर्श करें और थपथपाएं :- Gently touch and pat :- शिशु से बात करने के लिए मां के पेट को पर हल्का-हल्का स्पर्श करें, उसे हल्के हाथों से थपथपाएं। वह अच्छा महसूस करता है। मन को एकदम शांत कर, अपनी दोनों हाथ प्रेमपूर्वक अपने पेट पर रखें। आप महसूस करें कि आपका होने वाला शिशु आपके पास ही बैठा है और आप उससे बात कर रहे हैं। अपना पूरा ध्यान अब गर्भस्थ शिशु पर केंद्रित करके जैसा शिशु आपको चाहिए वैसा ही चिंतन कीजिये। ऐसा करते हुए आप आप शिशु का एक कल्पनात्मक चित्र बनाइये।
- शांत रहें :- Stay calm :- गर्भ संवाद करने के लिए सबसे पहले माँ किसी शांत और अनुकूल स्थान पर जाकर बैठ जाएँ। होने वाली माँ अपनी दोनों आँखों को बंद कर ले और शांतिपूर्वक लम्बी और गहरी सांस ले। ऐसा करने से तनाव से राहत मिलती है। सकारात्मक संचार मां और गर्भ में पलने वाले शिशु के लिए अच्छा महसूस कराने वाले हार्मोन रिलीज करता है, जिससे एक पोषण करने वाला माहौल बनता है।
गर्भ में पल रहे शिशु से बातचीत करने के फायदे Benefits of talking to your baby in the womb
- मन शांत होता है मां जब अपने बच्चे से बात करती है, तो इससे बच्चे की हार्ट बीट सामान्य होती है और उससे सूदिंग इफेक्ट पड़ता है। इससे पता चलता है कि मां की आवाज सुनने भर से बच्चे का मन शांत हो जाता है। साथ ही, बच्चे से बातचीत करने से मां भी खुशी का अहसास करती है। अगर बच्चा प्रतिक्रिया करे, तो मां की खुशी भी दुगनी हो जाती है।
- रिश्ता गहरा होता है मां को अपने गर्भ में पल रहे शिशु से जब-तब बात करनी चाहिए। बात करने से बच्चा अपनी मां के साथ गहरा लगाव महसूस करता है। उसे अच्छा लगता है कि उसकी मां उसके साथ अपनी आपबीती साझा कर रही है या उससे उसका हालचाल पूछ रही है। बातचीत करने के दौरान मां को चाहिए कि वह अपने पेट को सहलाए। ऐसा करने से बच्चा मां का स्पर्श महसूस करता है। कहने की जरूरत नहीं है कि ये सभी बातें मां-बच्चे के बीच के रिश्ते को मजबूत बनाती हैं।
- सकारात्मकता बढ़ती है हर व्यक्ति का अपना एक नेचर होता है। यह गर्भावस्था में ही तय हो जाता है। बच्चे में सकारात्मकता बढ़ाने के लिए जरूरी है कि मां बच्चे के साथ अच्छी बातें करें, उसे किताबें पढ़कर सुनाएं और अच्छे मेलोडी किस्म के गाने सुनें। ऐसा करने बच्चा गर्भ में ही सकारात्मक रहना सीख लेता है। जन्म के बाद उसके स्वभाव में सकारात्मकता अपने-आप ही झलकने लगती है।
- रोजाना थोड़ी देर बातचीत से बच्चे के दिमाग का विकास तेजी से होता है। इसकी मदद से उसकी समझने की क्षमता भी बढ़ती है।
- मां की आवाज और उसके संवाद से बच्चे को गर्भ में ही सुरक्षा का अनुभव मिलता है।
- गर्भ में पलने वाले बच्चे से बात करने से मां और बच्चे के बीच भावनात्मक रूप से जुड़ाव बढ़ता है।
- गर्भ संवाद करते वक़्त माँ के अंदर सकारात्मकता और ख़ुशी के भाव पैदा होते हैं। जब माँ खुश होती है तो उसमें पैदा होने वाले हैप्पी हार्मोन्स बच्चे को भी मिलते हैं। इन हार्मोन्स की वजह से बच्चे में पैदा होने वाली कई जेनेटिक बीमारियों की सम्भावना बहुत हद तक कम हो जाती है।
- जब माँ अपने शिशु से बातचीत करती है तो माँ को भी गर्भवस्था के दौरान होने वाले तनावों से मुक्ति मिलती है।
गर्भ संवाद शिशु के शारीरिक, मानसिक, सामजिक और आध्यात्मिक विकास में एक बहुत ही अहम भूमिका निभाता है।
गर्भ संवाद के लिए दिन के तीन समय सबसे अच्छे माने जाते हैं Three times of the day are considered best for Garbha Samvad
- प्रात काल :- Morning :- इस समय हमारा मस्तिष्क, शरीर और मन पूरी तरह से शांत होता है। इस समय अगर ध्यान करते हुए माँ अपने शिशु के साथ गर्भ संवाद करती है तो वो बहुत ही ज़्यादा प्रभावशाली होता है।
- दोपहर :- Afternoon :- ये दिन का समय होता है। इस समय भी माँ आने शिशु के साथ गर्भ संवाद कर सकती है। इस समय अगर संगीत के साथ गर्भ संवाद किया जाता है तो वो बहुत ही प्रभावशाली होता है।
- रात्रि :- Night :- रात्रि में सोने से पूर्व किया गया गर्भ संवाद शिशु के लिए भी अत्यंत लाभदायक होता है।
गर्भ संवाद में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए What things should be kept in mind during pregnancy dialogue?
- एक- एक शब्द जो माँ शिशु से बोलती है वो उसके चेतन और अचेतन मन पर गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए ये बेहद ज़रूरी है कि होने वाली माँ अपने शिशु से बात करते वक़्त बेहद सजकता से पेश आये।
- हमेशा ध्यान रखें के गर्भ संवाद सदा सकारतमकता पर केंद्रित रहे, किसी भी तरह की उदासी व नकारात्मकता गर्भ संवाद में ना हो|
- हो सके तो रात्रि में होने वाली माँ और पिता दोनो ही शिशु से साथ गर्भ संवाद स्थापित करें।
परामर्श :- Consultation
प्रेग्नेंसी के दौरान मां का गर्भस्थ शिशु से बात करना एक खूबसूरत अनुभव है। यह मां और बच्चे के बीच गहरा रिश्ता बनाता है और इससे दोनों के बीच एक अनोखा रिश्ता मजबूत होता है। यही वजह है हर मां को 18वें सप्ताह के बाद गर्भस्थ शिशु से बात करनी चाहिए।
गर्भ में पल रहे शिशु से संवाद करना माँ और शिशु दोनों के लिए ही एक बहुत ही लाभदायक प्रक्रिया है। इससे शिशु के सम्पूर्ण विकास को जन्म से पूर्व ही शुरू करके एक संस्कारी शिशु को प्राप्त किया जा सकता है। सभी गर्भवती महिलाओं को गर्भ संवाद ज़रूर करना चाहिए।
गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह का कोई भी समस्या हो रहा है। तो आपको स्त्री रोग विशेषज्ञ से जरूर सलाह लेना चाहिए। और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए।
कोई भी उपाय करने से पहले स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लें
गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को किसी भी प्रकार की कोई भी शारीरिक समस्या हो रही है; तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह ले और अपने आप से किसी भी दवाई का सेवन करने से बचें।
गर्भावस्था के दौरान कोई भी समस्या होने पर किसी भी दवाई , तेल ,जेली या क्रीम का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले।
डॉक्टर द्वारा दिए गए दवाओं का नियमित रूप से सही समय पर सेवन करें।
यह एक सामान्य जानकारी है। अगर आपको पीरियड्स मिस होने या प्रेगनेंसी से जुड़ी किसी भी तरह का कोई भी परेशानी, कारण या लक्षण दिखाइ दे रहे हैं। तो इन लक्षणों को नजर अंदाज न करें या इससे रीलेटेड कोई भी समस्या हो रहा है। तो आपको डॉक्टर से जरूर सलाह लेना चाहिए। और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। और इसका इलाज कराना चाहिए।
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